इस पोस्ट में हम एक कंजूस दर्जी और उसकी पत्नी की कहानी लिख रहे है, उम्मीद है कि आपलोगो को पसंद आएगी।
एक कंजूस दर्जी अपनी पत्नी के साथ रहता था। दोनों ही बहुत कंजूस थे। उनके घर अगर कोई मेहमान आता, तो उन्हें लगता कि कोई आफत आ गयी है। एक बार उनके घर दो मेहमान आये। कंजूस दर्जी फिक्रमंद हो गया। उसने सोचा कि ऐसी कोई तरकीब निकालनी चाहिए कि वे मेहमान यहां से चले जायें और उनकी खातिरदारी नहीं करनी पड़े।
दर्जी ने घर के अंदर जाकर अपनी पत्नी से कहा, ‘सुनो, जब मैं तुमको गालियां दूं, तो जवाब में तुम भी मुझे गालियां देना और जब मैं अपना गज लेकर तुम्हें मारने दौड़ूं, तो तुम आटे वाली मटकी लेकर घर के बाहर निकल जाना। मैं तुम्हारे पीछे-पीछे दौडूंगा। मेहमान समझ जायेंगे कि इस घर में झगड़ा हो रहा है और वे वापस चले जाएंगे।
दर्जी की पत्नी बोली- ‘अच्छी बात है।’
कुछ देर के बाद दर्जी दुकान में बैठा-बैठा अपनी पत्नी को गालियां देने लगा। जवाब में उसकी पत्नी ने भी गालियां दीं। दर्जी गज लेकर दौड़ा। दर्जी की पत्नी ने आटे वाली मटकी उठायी और भाग खड़ी हुई।
मेहमान सोचने लगे, ‘लगता है यह दर्जी बहुत कंजूस है। यह हमको खिलाना नहीं चाहता, इसलिए यह सारा नाटक कर रहा है। लेकिन हम इसे छोड़ेंगे नहीं। चलो, हम पहली मंजिल पर चलें और वहां जाकर सो जायें।
मेहमान ऊपर जाकर सो गये।
यह मानकर कि मेहमान चले गये होंगे, कुछ देर के बाद दर्जी और उसकी पत्नी दोनों घर लौटे। मेहमानों को घर में न देखकर दर्जी बहुत खुश हुआ और बोला, ‘अच्छा हुआ बला टली।’
फिर दर्जी और उसकी पत्नी दोनों एक-दूसरे की तारीफ करने लगे।
दर्जी बोला, ‘मैं कितना होशियार हूं कि गज लेकर दौड़ा!’
दर्जी की पत्नी बोली, ‘मैं कितनी फुर्तीली हूँ कि मटकी लेकर भागी।’
मेहमानों ने बात सुनी, तो वे ऊपर से ही बोले, ‘और हम कितने चतुर हैं कि ऊपर आराम से सोये हैं। मेहमान की बात सुनकर दर्जी और उसकी पत्नी दोनों खिसिया गये। उन्होंने मेहमानों को नीचे बुला लिया और अच्छी तरह खिला-पिलाकर विदा किया।
इस कहानी से सीख: कंजूसी से रिश्ते टूट जाते हैं, उदारता से दिल जुड़ते हैं।
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