घने जंगल के बिच एक बड़ा हाथी रहता था, उसका नाम मोंटी था। मोंटी हाथी बहुत ही सीधा – साधा और मेहनती था। वह किसी की भी मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहता था। लेकिन उसकी एक अजीब सी इच्छा थी। मोंटी हाथी को साईकिल चलाने की बहुत इच्छा थी।
मोंटी की साइकिल:
एक दिन जंगल के बाजार में उसने लाल रंग की चमकदार देखी। साइकिल देखते ही उसका मन मचल उठा, लेकिन साइकिल वाले ने हंसते हुए कहा – अरे हाथी भाई ! ये साइकिल तुम्हारे लिए नहीं बनी. यह साइकिल तुम्हारा वजन नहीं सह पायेगी।
हाथी को यह सुनकर बहुत दुःख हुआ। वह दुबला होने के लिए खूब व्यायाम करने लगा, पर ऐसा हो न पाया क्योंकि वह तो एक हाथी था।
पर उसने हार नहीं मानी। उसने ठान लिया कि वह अपनी खुद की साइकिल बनाएग, जो उसके वजन को संभाल पायेगा। मोंटी हाथी ने जंगल से मोटी मोटी मजबूत लकड़ियां इकठ्ठा किया। फिर लोहार भालू की मदद से लोहे का पहिया बनाया गया। फिर भालू खरगोश कारीगर ने एक आरामदायक सीट बनायीं। तोते ने रंग – बिरंगी पेंटिंग करके सजाया। इस तरह सभी की मदद से मोंटी हाथी की खुद की एक मजबूत साइकिल तैयार हो गयी।

मोंटी जब पहली बार अपनी साइकिल पर चढ़ा और साइकिल चला कर जंगल की ओर गया तो जंगल के सभी जानवर उसे देखने के लिए इकठ्ठा हो गए। कुछ जानवर उसकी हिम्मत की तारीफ कर रहे थे तो वही कुछ जानवर उसका मज़ाक भी उड़ा रहे थे। मोंटी हाथी बिना किसी की परवाह किये साइकिल चलाता रहा। पहले तो साइकिल थोड़ी डगमगायी, लेकिन थोड़ी ही देर में मोंटी हाथी ने साइकिल चलाना सीख लिया।
मोरल ऑफ द स्टोरी:
इस कहानी से शिक्षा: अगर हम सच्चे मन से मेहनत करें और हार न मानें, तो कोई भी सपना असंभव नहीं रहता। सफलता उन्हें ही मिलती है जो लगातार प्रयास करते रहते हैं।
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